लेखिका के लिए प्रशंसा पत्र एवं आलोचनाएँ

सितम्बर 7, 2026

"ब्याहता"

'Lawfully wedded wife'

"ब्याहता" के लिए स्व. कमलेश्वर के दो शब्द

वरिष्ठ साहित्यकार, पद्म भूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित

इस संग्रह की सभी कहानियों में स्त्री हमेशा चिंतनशील और गतिशील दिखाई देती है। यहां स्त्री की खास चिंता मूलतः एक सुखद परिवार के लिए है। एक ऐसा परिवार, जहां हंसते खिलखिलाते लोग हों, जहां का शैक्षिक और आर्थिक माहौल इतना अनुकूल जरूर हो कि परिवार के सदस्यों के बीच दुःख या तनाव की आहट भी ना हो।

प्रेमा खुल्लर की कहानियों में खास तौर पर पारिवारिक सदस्यों के बीच संबंधों की कई बारीक भावनात्मकता की परतें खुलती हैं। हर परिवार में सभी सदस्यों का अपना अपना अस्तित्व होता है। चाहे वह सास, बहू, ननद, देवर हो अथवा बुजुर्ग दादा-दादी । चूंकि स्त्रियां परिवार के केन्द्र में होती हैं जो कि अपनी प्रकृति के मुताबिक त्याग और संघर्ष तो करती ही हैं, साथ ही अपनी अहमियत, अपने अभिमान और अपने बडप्पन को भी किसी हाल में खण्डित नहीं होने देतीं। स्त्री का वजूद और उसकी अस्मिता बनाम् उसका अस्तित्व जैसी कहानियां ही क्यों ना हों।

प्रेमा अपनी इन कहानियों में जिस तरह पारिवारिक घटनाओं, प्रसंगों का ताना बाना बुनती हैं, वह भी कम काबिले तारीफ नहीं है। यह लेखिका के अनुभव क्षेत्र के बड़े विस्तार की तरफ इशारा करता है। 'छलते रिश्ते' और 'ब्याहता' जैसे कहानियों में देखिये कि किस तरह उन्होंने संबंधों के सैलाब का चित्रण किया है। इन कहानियों में भले ही भावावेश की तीक्ष्णता का सीधा अहसास ना होता हो, लकिन भावनात्मकता की द्वंद्वात्मक गुंजाइश हरदम इनमें दिखाई देती है। इसके अलावा इन कहानियों की भाषा शक्ति भी कम अहम् नहीं है । प्रेमा ने जिस आसान सी भाषा में अभिव्यक्ति दी है, वह आम पारिवारिक और घरेलू महिलाओं की समझ में भी आने वाली भाषा है। वस्तुतः इन कहानियों का लक्ष्य भी गृहिणी से लेकर मध्यवर्गीय कामकाजी महिलाएं ही हैं। इसलिए इस वर्ग की आम सी लगने वाली समस्याओं का सहज, सघन और आत्मीय चित्रण इन कहानियों में हुआ है।

सहज संवेदना और आज के जरूरी कथ्यों से भरी इन कहानियों के लिए मेरी शुभकामनाएं।

"ब्याहता"

'Lawfully wedded wife'

"ब्याहता" के लिए स्व. प्रोफ. शुकदेव सिंह के दो शब्द

वरिष्ठ साहित्यकार, प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), BHU

यदि 'छलते रिश्ते' से ही बात शुरू की जाए तो कहानी के नाम से एक अनचीन्हा भय झुरझुरी पैदा कर सकता है। यदि 'छलते रिश्ते' कहानी की पहली पंक्ति पढ़ी जाए जो मुँह में पानी आ जाए। पहली पंक्ति है ... भाभो की जीभ आज फिर आम के आचार पर चटकारे मार रही थी। दो बहुओं व तीन बेटियों के परिवार की अच्छी पौध लगा ली थी। भाभो ने, पर जवानी वाली चटोरी हरकत उनके दरवाजे आज भी दस्तक दे रही है। यह कहानी की पहली टिप्पणी अगर कोई गैर कहता तो बुरा लगता। इसे ननद कह रही है। पर भाभो पर इस तरह की टिप्पणी करने का हिन्दुस्तानी जमात में प्रचलित अंदाज है। शुभ अवसर पर शादी विवाह में ऐसी टिप्पणियों को गारी कहते हैं । सोने की थाली में जेवँना परोसते हुए औरतों का झुण्ड का झुण्ड पर्दे की आड़ से गारी गाता है। तब पुखा पत्तल में परोसा भोजन सोने की थाल का जेवना बन जाता है। लेखिका ने जीवन की जटिलताओं का तमाम तरह के उतार-चढ़ाव में वर्णन करते हुए भाभो अट्ठानवे साल की बूढ़ी हो चुकी थीं फिर भी टूटे सँवरे अपने परिवार को समेटे बैठी थीं। नतीजा यह हुआ कि समीर ने अपनी पूरी सम्पत्ति ट्रस्ट के नाम देकर वृद्धाश्रम में अपना घर बनाया। यह कहानी सहसा वृद्धों की समस्या से जुड़ जाती है। मेरे लिए इस रचना की सार्थकता दूसरी तरह से है। मैं इस समय भारत सरकार की वृद्धों की समस्या का एक सक्रिय अधिकृत सदस्य हूँ और स्वयं बूढ़े होने की तमाम जटिलताओं को भुगत रहा हूँ। लेखिका की यह रचना मेरे जैसे वृद्धों के लिए एक आह्लादक स्पर्श भी है और मेरे सहित तमाम वृद्धों का पनाहघर भी है। उन्होंने अनजाने अपनी कहानियों को पढ़ने का प्रस्ताव किया होगा लेकिन मुझे लगा कि 'ब्याहता' संग्रह की कहानियों के पाठक यहाँ वहाँ सर्वत्र मिल जाएँगे ।

दूसरी कहानी 'तन्हाई में नौकरी के लिए जूझते इस जमाने में जब एक युवक को नौकरी मिल जाती है तो माता-पिता खुश होते हैं। बहन कहती है कि रात रात भर जागकर आपकी पढ़ाई का बीच में टूटना कैसा लग रहा है। लेकिन लड़का बहन की बात को बिना सुने चला जाता है। फिर प्रेम के चक्कर चलते हैं। मितीशा और नीलांत का संवाद फिर भीतर और बाहर की दुनिया का संवाद | भाई की पढ़ाई छूट जाती है और बहन क्वाँरी रहकर ही माँ बाप के लिए खास तरह की जिन्दगी जीने लगती है। फिर अनन्या है, ईशा है। ईशा का विवाह भी हो जाता है, अनन्या की बेटी भी चली जाती है, नौकरी भी छोड़ देती है और वह बुढ़ापे की तन्हाई में चली जाती है । यह कहानी भी वृद्धों की समस्या से जुड़ी है। मेरे कार्यक्रम के लिए यह एक सब्जेक्ट है इसका पाठ पाठकों के लिए एक सुखद प्रतीति तक ले जाएगा ।

तीसरी रचना 'ब्याहता' कहानी नहीं एक उपन्यासिका है जिसे प्रायः अड़तीस पृष्ठों में लिखा गया है। जात्यानी के आस पास ठहरी हुई यह कहानी एक सुखद अहसास से भरी हुई है। इस कहानी को समानता न होने पर भी कृ ष्णा सोबती की कहानी 'ऐ लड़की' के पाठ्यक्रम में पढ़ना चाहिए जिसे उपेन्द्र नाथ 'अश्क' जैसे बड़े लेखकों ने भी कहानी कहा था। जब मैंने उसे कहानी नहीं माना तो बड़ी हाय तौबा हुई । अन्ततः वह रचना 'लघु उपन्यास' के रूप में छप गयी। लोगों की बोलती बंद हुई। लगता है कि 'ब्याहता' को लोग कहानी की तरह पढ़ेंगे, उपन्यास की तरह याद रखेंगे। लम्बे समय तक अपने आदमी की प्रतीक्षा करते हुए 'मुस्कान' जयन्त के मुँह पर हाथ रखते हुए एक माफीनामा लिख देती है। यह माफीनामा ही हिन्दुस्तानी औरत का बल है- अबला का बल ।

'दो गज कपड़ा' नामक अगली रचना में ठकुराइन है। दिल हिला देने वाली एक करुण गाथा है बिल्कुल गाँव की भाषा में उतरकर जिस औरत को पाँच गज के कपड़े से नहीं ढका गया वह ठकुराईन ऐसे गई, वैसे गई, कैसे गई? एक बूढ़े का बूढ़ा दर्द इस कहानी में भी है 'अस्तित्व' कहानी तमाम तरह के उतार चढ़ाव में चलती जिन्दगी को अंतिम पाठ में यह लिखती है कि नैना की आँखों में एक अध् र करने वाला इंतजार था । यह कहानी भी लम्बे अर्थात् वृद्ध होते हुए प्रतीक्षा की कथा है। 'प्यास कहानी पानी के बारे में है। अपने देश बिरादरी का सम्बन्ध हुक्का पानी से होता था। लोग पौधों में पानी देते थे। अपने घर के लोगों के मरने के बाद तर्पण करते थे। अनेक त्यौहार और उत्सव नहाने के ही होते हैं। नदी, ताल, पोखरे, कुंड, कूप, कुइयाँ और झरना तक भारतीय जिन्दगी का प्रणाम अर्पित है। प्रतिष्ठा को भी 'पानी' कहते हैं- रहिमन पानी राखिए। उसका पानी उतर गया, वह पानी पानी हो गया। उसके चेहरे पर पानी है और अब इस देश में पानी बिक रहा है।

'ब्याहता संग्रह की कहानियाँ एक स्त्री के द्वारा लिखी गई हैं और प्रायः स्त्री के विषय में ही लिखी गईं हैं। मुझे प्रसन्नता है कि इसमें स्त्री विमर्श नहीं है । आजकल स्त्री विमर्श के नाम पर अश्लील और फूहड़ एक सीमा तक बोल्ड साहित्य लिखा जा रहा है। 'ब्याहता संग्रह की कहानियों में लज्जा और संकोच का दिखावा नहीं है लेकिन निर्लज्जता और अश्लीलता का फूहड़पन भी नहीं है । बहुत चलती हुई भाषा और मचलती हुई अर्थवत्ता के साथ ये कहानियाँ मान सरोवर के हंस और काकभुशुण्डि दोनों से संवाद करती हैं। 'मानसरोवर' निश्चित रूप से लेखिका का 'मानस' है जिसमें आधुनिक दुनिया की हर तरह की निर्ममता, बर्बरता और दैहिकता के पाठान्तर और आंतरिक पाठ हैं।

बहुत ही सार्थक भाषा में लिखी हुई ये रचनाएँ कथा जगत की एक नई दुनिया बनाती है। इन कहानियों में अद्भुत पठनीयता है जटिलता कत्तई नहीं है। भगवती प्रसाद बाजपेयी, विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक और प्रेमचन्द जैसी सुगम पठनीयता है। यह भी लगता है कि लेखिका आधुनिक अद्यतन जिन्दगी से खूब परिचित है। वह बम्बई से लेकर गाँव तक की जिन्दगी के पुराने, नएपन, वृद्ध जीवन की जटिलताओं, स्त्री की चरित्रहीनता और भारतीय नारी की अनंत प्रतीक्षा, प्रेम सतीत्व और सदाचार को भी जानती है, देह के सम्मोहन, आकर्षण और पतिताचार को भी पहचानती है।

लेखिका का रचना संसार एक पूरी औरत है, निरंतर जवान होती हुई, बूढ़ी होती हुई । खिड़की दरवाजे हवा पानी से ताल्लुक रखती हुई, बनती हुई, बिगड़ती हुई गंध से मह मह दुर्गंध से भी ग्रस्त आदमी के भीतर स्वभाव, न देवता, न शैतान इस तरह की सुर की गतिशीलता को मैं मद्धम सुर का गद्यछंद कहना चाहूँगा । लय लेकिन संगीत का पंचम सुर नहीं, दुःख लेकिन शीत्कार, चीत्कार के बीच का संयम । मुझे विश्वास है कि लोग इन कहानियों को पढ़ेंगे और हूँ हाँ कहते हुए इन कहानियों का पाठक होने में रस और स्वाद का अनुभव भी करेंगे।

क्षमा करें कहानियों के पाठ में मैं लेखिका का नाम ही भूल गया । लेखिका का नाम है डॉ. प्रेमा खुल्लर । लेकिन नाम से क्या होता है? उनकी रचना से उन्हें नामयश मिलेगा। नाम रहने पर भी लोग नाम के लिए ही काम करते हैं ।

"मैं सोचती हूँ"

"In My Perspective"

"मैं सोचती हूँ" के लिए स्व. डॉ० लक्ष्मी मल सिंघवी के दो शब्द

"भारतीय न्यायविद, सांसद, विद्वान, वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक, राजनयिक"

"पद्म भूषण से सम्मानित, भारत के दूसरे सबसे लंबे समय तक सेवारत उच्चायुक्त"

डॉ० प्रेमा खुल्लर ने जो निबंध अपनी पुस्तक "मैं सोचती हूँ" में संग्रहीत किए हैं, मुझे इस आमुख के माध्यम से उनकी भावभूमि और चिन्तन भूमि की सराहना करने में हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति होती है।

सोचना और विचारना अस्मिता और अस्तित्व के चैतन्य का परिचायक है। प्रत्येक निबंध में डॉ० प्रेमा खुल्लर का सोच प्रतिध्वनित होता है, उनकी चिन्ता और उनके चिन्तन का, उनके विचारों के विचरण का और जीवन दर्शन के सामाजिक संदर्भों का संवेदनशील विश्लेषण, सर्वेक्षण और आकलन परिलक्षित होता है। डॉ० प्रेमा खुल्लर के इस निबन्ध संसार में नीति का नेतृत्व है, भारतीय निष्ठा है, मर्यादा का मार्गदर्शन है, अध्यात्म की अन्तःसलिला है; परम्परा, जीवन, समाज, संस्कारों एवं संस्कृति को समझने-समझाने, पर्यावरण की ललक है। इस निबंध सृष्टि में पृथ्वी के प्रति मातृभक्ति का संगीत है तो पृथ्वी के सकरण वात्सल्य के प्रति कृतज्ञता का गीत भी है। वायु, वृक्ष, फूल, प्रकृति और पर्यावरण का उत्सव है तो भारतमाता की प्रशस्ति और भारतवासियों को निमंत्रण, आह्वान और उद्बोधन भी।

इस निबंध संग्रह में लेखिका ने शरीर, घर, भूख, पैसा, जूठन, ठोकर, बुजुर्ग, व्यवहार, मधुर संभाषण, फर्ज़, तड़प, संस्कार, विचार, मन, व्याकुलता, तनाव, प्रार्थना, भावना, पाप, अपमान, घुटन, वन्दना, त्याग, सुख, सौन्दर्य, संतोष, आनन्द, मूर्ख, आलस्य जैसे विषयों पर विचारोत्तेजक सकारात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है।

मंगल अमंगल एवं भारत में मांगलिक चिन्हों के महत्त्व पर दो अत्यन्त सुबोध लेखों में लेखिका ने विवेक-सम्पन्न विमर्श को सहेजा है और ऊँ, स्वस्तिक, तुलसी, रंगोली, बंदनवार, मंडप इत्यादि चिन्हों की सुन्दर प्रतीकात्मक व्याख्याएँ सँजोई हैं।

डॉ० प्रेमा खुल्लर के निबंध संसार में वस्तुतः जीवन की धरती और मूल्यों के आकाश की प्रतीति एक निर्झर की तरह कलकल निनाद सहित प्रवाहित होती है। यह निर्झर भारतीय संस्कृति और जीवन शैली की जान्हवी के निर्मल जल के कलकल निनाद द्वारा हमारे सोच को और जीवन को अभिसिंचित करने की क्षमता और सामर्थ्य से सम्पन्न है और इसीलिए डॉ० प्रेमा खुल्लर के इस पठनीय एवं विचारणीय निबंध संग्रह का स्वागत करने में मुझे विशेष प्रसन्नता है।

कई दशक पूर्व मैंने एक परम्परागत सूत्र का प्रतिवाद करते हुए लिखा था-

यशकीर्ति अर्थ भी नहीं, न सुख-वैभव है, प्रभुता केवल संयोग-समागत क्रम है, जीना ही अंतिम ध्येय नहीं जीवन का, जीवन का मर्म समझना ही जीवन है।

यह निबंध संग्रह जीवन के मर्म को समझने का एक उपक्रम है।

"मैं सोचती हूँ"

"In My Perspective"

"मैं सोचती हूँ" के लिए मुनि लोकेश के दो शब्द

भारतीय जैन साधु, लेखक और वक्ता, जिनके काम का विषय अहिंसा, विभिन्न धर्मों के बीच बातचीत और समाज सुधार है।

'राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार कैलिफ़ोर्निया असेंबली और सीनेट द्वारा सम्मान अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वयंसेवक सेवा पुरस्कार'

चिंता के भयावह दौर से निकलकर चिंतन की ओर अभिमुख होना श्रेयस्कर होता है। जगत में सभी लोग ऐसा कर नहीं पाते हैं। इसमें भी मुख्य बात यह है कि चिंता के संव्यूहन से निकलकर भी मनुष्य अपने संशयों के घेरे में घिर जाता है। अतः जो चिंतन के सार्थक क्षण जुटाकर इस पथ पर आगे चल पड़ता है वह अपनी जिगीषा के साथ जीवन जीने में सफल हो जाता है।

शब्द और भाव के चिरंतन अन्वय की प्रखर दृष्टा डॉ० प्रेमा खुल्लर विचार का सामर्थ्य रखती हैं। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं में सृजन करने के साथ विचार की दृष्टि से भी बहुत आगे तक जाना चाहती हैं। यहाँ यह उल्लेखित करना प्रासंगिक ही होगा कि सृजक और विचारक दो विभिन्न धाराओं में बहते हुए युग का पथ-दर्शन करते हैं। एक का ध्येय है कल्पना को अभिव्यक्त करना और दूजे की दृष्टि में विचार पर केन्द्रित रहते हुए निष्कर्ष तक पहुँचने की दिशा में एक ज़मीन तैयार करना। डॉ० प्रेमा खुल्लर किसी निवह से भिन्न अपनी मौलिक अस्मिता को आकारित करतीं सृजन के माध्यम से अपनी पहचान बना चुकी हैं। विधा चाहे कोई हो, डॉ० खुल्लर अपने सृजन के द्वारा पाठक के चिंतन तंतुओं को अवश्य ही झकझोरती हैं। जहाँ यह प्रक्रिया सहज रूप से शुरू हो जाती है वहीं से पाठक डॉ० प्रेमा खुल्लर के साथ सृजन अवबोध की एक सार्थक यात्रा पर आगे निकल जाते हैं।

'मैं सोचती हूँ' एक विचार-प्रक्रिया की शुरुआत है। जिन बिन्दुओं को शब्द और भाव की नाव में बिठा कर डॉ० खुल्लर ने इन टिप्पणियों की व्याख्या की है वे जीवन से जुड़े विषय हैं। अतीव निकटवर्ती और मन की तहों से गुँथे हुए वैचारिक बिन्दुओं की सरल, सरस व सुबोध व्याख्या डॉo खुल्लर के विलक्षण सृजन सामर्थ्य को सामने लाती है। पाठक इन्हें पढ़कर अभिभूत होगा और लाभान्वित भी।

'जीवन' से लेकर 'मैं और मेरा भारत' शीर्षक की इन सुव्याख्यायित लघु निबंधात्मक टिप्पणियों की एक और विलक्षणता है इनकी व्याख्या की गेयता और बहुत छोटी-छोटी किन्तु मार्मिक व विचार को विस्तार देती टिप्पणियाँ। डॉ० प्रेमा खुल्लर की अन्य कृतियों से भिन्न यह पुस्तक सचमुच चिंतन के कुछ सार्थक क्षण जुटाने का प्रयास है जिसकी व्यापक वर्गों में सराहना होनी चाहिए ।

"मैं सोचती हूँ"

"In My Perspective"

"मैं सोचती हूँ" के लिए डॉ० लक्ष्मी शंकर बाजपई के दो शब्द

प्रसिद्ध कवि, ग़ज़लकार और संचार विशेषज्ञ; सेवानिवृत्त उप-महानिदेशक, AIR आकाशवाणी

"बच्चों के साहित्य के लिए दिल्ली हिंदी अकादमी पुरस्कार"

जो लोग थोड़ा भी सोचते हैं तो वे सबसे ज्यादा ये सोचकर परेशान होतें होंगे कि लोग सोचते क्यों नहीं? अगर लोग सोचते होते तो हमारे जीवन में इतनी अशांति, इतनी हिंसा, इतनी घृणा, इतना दुःख न होता । अदालतों में करोड़ों मुकदमें न होते। अगर लोग सोचते होते तो जिस दशहरे के मेले में बुराई के प्रतीक रावण को जलाया जाता है, उसी मेले में कई रावण अपने कुकर्मों को अंजाम नहीं देते और मेले में भारी पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता न पड़ती। अगर लोग सोचते होते कि सबकी रगों में एक ही खून है तो धर्म के नाम पर इतना खून-खराबा न होता, दंगे-फसाद न होते। दुकान-मकान न जलाए जाते। हजारों लाखों निर्दोष मौत के घाट न उतारे जाते। अगर लोग सोचते तो हवा, पानी, मिट्टी सब इतने प्रदूषित न हो पाते कि पूरी धरती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता। यूँ देखा जाए तो सोचने-समझने का विवेक ही है, जो पशु एवं मनुष्य में एक निर्णायक अंतर उपस्थित करता है। किन्तु मनुष्य हृदय एवं मस्तिष्क के होते हुए भी क्या आँख, कान आदि के बावजूद सबकुछ देखते-सुनते हुए भी, सोचना- विचारना छोड़कर अपने दिल-दिमाग की आवाज़ को नकारकर जाने-अनजाने उजाले से अँधेरे की ओर प्रस्थान कर देता है। उसके मन के दर्पण में जम जाती है। इसी कारण तो धरती पर अनेक अवतारों, महापुरुषों, पैगम्बरों को बार-बार आकर मनुष्यों के सोए विवेक को जगाना पड़ता है । अनेकानेक साहित्यकार, मनीषी, चिंतक भी इसी प्रयास में लगे रहते हैं। मनुष्यों के मन के दर्पण पर जमी धूल को हटाने का एक लघु प्रयास लेखिका प्रेमा खुल्लर भी अपनी कृति के माध्यम से करती हैं, जो "मैं सोचती हूँ” के रूप में हमारे सामने है।

'मैं सोचती हूँ' की लेखिका जीवन को गहराई से देखती हैं, उस पर चिंतन-मनन करती हैं और फिर अपनी सोच को कलम के माध्यम से समाज से सांझा करने का प्रयास करती है। एक कवयित्री एवं संवेदनशील रचनाकार होने के कारण वे रोजमर्रा के जीवन में आती जा रही विसंगतियों, टूटते रिश्तों, बिखरते जीवन-मूल्यों, लुप्त होती श्रेष्ठ परम्पराओं, हास होती मर्यादाओं, बढ़ते तनावों, आधुनिकता के नाम पर हावी हो रहे खोखले प्रदर्शनों, आचरणों से आहत एवं चिन्तित होकर, अपने विचारों को शब्दबद्ध करती हैं तथा उनमें महान ग्रंथों के उद्धरणों एवं महापुरुषों के विचारों एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों की काव्योक्तियों का समावेश कर उसे एक लघु निबन्ध जैसा रूप देती हैं। ये छोटे-छोटे लेख उन पुष्पों की भाँति हैं, जो जीवन- सुरभि बिखेरते हैं।

लेखिका रोजमर्रा के जीवन से ही अपने विषय उठाती हैं। इनमें मानवीय रिश्ते, मानवीय भावनाएँ, मानव व्यवहार के विभिन्न आयाम तथा सामाजिक एवं नागरिक जीवन के अनेकानेक पहलू सम्मिलित हैं। वे सीधी-सादी भाषा में, सीधे-सादे लहजे में अपनी बात कह देती हैं। उपदेशक होने का भ्रम वे कभी नहीं पालतीं । वरन् एक तार्किकता एवं विवेचना के साथ वे अपनी बात पाठकों के समक्ष रख देती हैं। उनके सम्पूर्ण लेखन का उद्देश्य एक स्वस्थ एवं प्रगतिशील समाज की स्थापना है, जैसा कि वे अपने एक लेख में लिखती हैं-

"देश की दृढ़ता समाज की दृढ़ता पर आधारित होती है । देश का जीवन समाज के जीवन पर आश्रित होता है। हम सभी भारतीयों का केवल एक ही ध्येय होना चाहिए कि स्वस्थ प्रगतिशील एवं दुर्गुणों से रहित समाज की स्थापना करें। भले ही उसके लिए हमें अपनी जान की बाजी लगानी पड़े। समाज के ढाँचे में परिवर्तन करना पड़े, पर देश के प्रति, समाज के प्रति, उसके सुखमय भविष्य के प्रति ऐसा करना हमारा पावन कर्त्तव्य हो ।”

(मैं और मेरा भारत)

आज के युग में हम घर-घर में अशांति का वातवरण देखते हैं। ऐसा क्यों है ? क्या घर सिर्फ ईंटों से बना भवन है। लेखिका 'घर' शीर्षक से लेख में अपने विचार-बिन्दु प्रस्तुत करते हुए कहती हैं

"घर किसे कहें? घर मिट्टी, गारे, ईंटों से बना भवन नहीं है । घर का मतलब जिसमें लोग रहते हों। उन लोगों में भाव, भावना, संस्कार, सत्कार हो । जहाँ स्वच्छता, पवित्रता, सत्यता, त्याग और उत्सर्ग हों। जहाँ अतिथि सेवा, गुरु और ईश्वर की आराधना होती हो। जहाँ प्रेम और सौहार्द हो । गुरुजनों का सम्मान हो। इसके अतिरिक्त जहाँ सुनियोजित कर्म दायित्व निभाते हुए लोग सबको सुखी एवं संतुष्ट करते हों, सच्चे अर्थों में घर तो वही है।"

(घर)

इस मशीनी युग में हमने अपनी कई श्रेष्ठ परम्पराओं एवं संस्कारों का तिरस्कार एवं त्याग कर दिया है। लेखिका 'जूठन' शीर्षक से लेख में उन्हीं परम्पराओं की याद दिलाते हुए लिखती हैं:

"पहले भोजन या कुछ खाने की चीजें बनाने के बाद ठाकुर को भोग लगाया जाता था और उसे परिवार में प्रसाद की तरह खाया जाता था । पर आज प्रसाद की थाली का तिरस्कार करने में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि विचारों में पुरानी परम्पराओं की कोई कद्र नहीं है।"

(जूठन)

इस मशीनी युग की आपाधापी में ही हमारे रिश्ते-नाते भी सिकुड़ गए हैं। हम पूरी तरह अपने लिए ही जीने को अभिशप्त हो गए हैं। 'संक्षिप्त सम्बन्ध' लेख में लेखिका लिखती हैं:

"वह समय लद गया जब कई पीढ़ियाँ एक परिवार में मिल-जुलकर रहा करती थीं। सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख के समान भागीदार थे। एक दूसरे के लिए जीते मरते थे। पर आज संयुक्त परिवार लगभग खत्म हो रहे हैं और सम्बन्धों का लोप होता जा रहा है। स्वाभाविक है कि प्यार तो लुप्त होगा ही ।"

(संक्षिप्त सम्बन्ध')

इसी स्वार्थपरता एवं आत्मकेन्द्रित व्यवहार के कारण ही महानगरों में छोटी-छोटी बातों पर जानलेवा संघर्ष की ख़बरें हमें आए दिन अख़बारों में देखने को मिलती हैं।

लेखिका ने अनेक सूक्ष्म मनोभावों को भी लेखन का विषय बनाया है । 'व्याकुलता' शीर्षक से लेख में अपने विवेचन में आप लिखती हैं:

"व्याकुलता को किसी भी परिधि में बाँध नहीं सकते। इसकी कोई सीमा नहीं है। कभी-कभी लोग बड़ी-बड़ी बातों से भी चिंतित नहीं होते, पर कभी-कभी लोग किसी छोटी-सी दुर्घटना से व्याकुल हो उठते हैं। जहाँ मन में अस्त-व्यस्तता होगी, वही व्याकुलता होती है। किसी को अपने तन की तरफ से कष्ट है, कोई मन की तरफ से चिंतित है, कोई धन की वजह से परेशान हैं, जिधर देखो उधर ही व्याकुलता है।"

(व्याकुलता)

लेखिका ने अपनी विवेचना के साथ-साथ तुलसी, कबीर, रहीम जैसे संत कवियों एवं संस्कृत ग्रंथों से उद्धरणों, सूक्तियों को समाहित करके उसे और अधिक विचार सम्पन्न बनाया है। कुछ लेख सूचनापरक भी बन पड़े हैं। ऐसे लेखों में 'मंगल-अमंगल', 'भारत में मांगलिक चिह्नों का महत्त्व' आदि को रखा जा सकता है। 'फूल' एवं 'प्रेम' जैसे लेख अपनी कोमल एवं काव्यात्मक भाषा के कारण ललित निबंध बन पड़े हैं।

"प्रेम सुगन्ध है जो तन, मन और चारों तरफ के परिवेश को सौरभ युक्त रखता है। प्रेम, तन, मन, भावनाओं और अपने आसपास को स्वस्थ एवं सुन्दर रखता है। जहाँ प्रेम है वहाँ थकान या कष्ठ ठहरता नहीं । प्रेम पूजा है, जिसकी लोग दूर-दूर तक चर्चा ही नहीं आराधना भी करते हैं। प्रेम, प्रतिष्ठा का रूप है। अमर प्रेम अनेक को एक करता है। प्रेम हमेशा विद्यमान है, प्रेम बिना तलवार के शासन करता है।

(प्रेम)

लगभग हर लेख में ऐसे विचार सहेजे गए हैं, जो व्यक्तित्व विकास की कुंजी बन सकते हैं। इन लेखों से पाठक आशा, उत्साह एवं आस्था विश्वास ग्रहण कर सकता है-:

"समय ही जीवन है। जिसने समय नष्ट किया, उसने जीवन समाप्त कर दिया क्योंकि समय थकता नहीं, बढ़ता जाता है और जीवन भी थकने वाली चीज़ नहीं। वह भी समय की तरह हाथ से छूट जाने वाला है।"

(जीवन)

"ठोकर विवेक को जाग्रत करता है। ठोकर एक सीख है। इसके खाने के बाद आदमी गलतियाँ कम करता है। ठोकर शरीर पर लगा घाव नहीं, यह तन-मन का घाव है। आत्मविश्वास को जगाने वाली ठोकर है। ठोकर विकास की जननी है। ठोकर खाकर व्यक्ति में चेतना का अभ्युदय होता है और व्यक्ति सतर्क हो उठता है ।"

(ठोकर)

"जब मानव में यह ज्ञान हो जाए कि मेरे अंदर कौन-कौन सी त्रुटियाँ हैं, मुझमें कितना अज्ञान है, मैं कितना कम जानता हूँ, मैंने संसार को क्या अच्छाई दी, मैं तो एक सामान्य व्यक्ति हूँ। जब वह अपने अज्ञान को महसूस करे, तो यह महसूस होना ही ज्ञान है।"

(ज्ञान)

"हम अपने व्यवहार से भी संसार में बहुत कुछ पाते और खोते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि हम अपने अच्छे व्यवहार से अपने भाग्य का निर्माण कर लेते हैं। क्योंकि सद्व्यवहार स्वयं में बड़ा ही विनम्र, धैर्यवान, दयावान, विवेकी और ज्ञानी होता है। हमारे अच्छे व्यवहार के परिणामस्वरूप हमें नए-नए रास्तों का ज्ञान होता है और उस ज्ञान के परिणामस्वरूप भाग्य बदलते मिले हैं।"

(व्यवहार)

"अच्छे विचारों से भविष्य का निर्माण भी अच्छा होता है। जीवन के हर पल में उन्नति का कारण हमारे अपने अच्छे विचार ही हैं। जैसे-जैसे मनुष्य के विचारों का धरातल अच्छा दिखता है वैसे-वैसे मानव का अन्तर्मन सुन्दर, दयावान व विनम्र दिखाई पड़ता है। अच्छे विचारों से संयुक्त होना संक्षिप्त परमात्मा का स्वरूप है।"

(विचार)

41 लेखों से युक्त यह पुस्तक उस लघु वाटिका के समान है, जिसमें 41 ऐसे पौधे हैं जिनकी हर शाख, हर पत्ती, हर फूल बहुमूल्य सुविचारों को संजोए हुए है। वर्तमान युग में जहाँ अधिकांश लोग दिशा-भ्रमित हैं. संवेदनहीनता लगातार पाँव पसारती जा रही है एवं मानव अमानवीयता का शिकार होता जा रहा है, उसने सोचने-विचारने को भुला दिया है और अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर अनजान रास्ते में भटकने को आतुर है, यह पुस्तक एक सार्थक एवं रचनात्मक हस्तक्षेप करने वाली कृति के रूप में उपस्थित होती है ।

सहज, सरल, भाषा में सीधा संवाद करने वाली यह कृति पाठकों से सार्थक संवाद करेगी, उन्हें प्रेरित करेगी एवं एक नये जीवन का संदेश देगी। ऐसा विश्वास किया जा सकता है ।

"राह बना लूँगी"

"I will carve out a path"

"राह बना लूँगी" के लिए स्व. डॉ० श्याम सिंह शशि के दो शब्द

प्रसिद्ध भारतीय सामाजिक-मानवविज्ञानी, वरिष्ठ साहित्यकार और कवि।

पद्म श्री से सम्मानित, इंटरनेशनल रामा यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड चांसलर। कोलंबो यूनिवर्सिटी से डी.लिट की उपाधि।

सृजन किसी व्यक्ति, समाज अथवा वर्ग-विशेष की बपौती नहीं होता । कब किस हृदय से काव्यधारा फूट पड़े, नहीं कहा जा सकता कविता एक आग है जो भावातिरेक के क्षणों में स्फुलिंग की तरह फूट पड़ती है अथवा मानसरोवर के ब्रह्मपुत्र की उफनती धारा बनकर विस्तृत आकार ले लेती है, जो कभी वसुन्धरा को लहलहाती है जो कभी अपने कूल - कगार को तोड़ती हुई विकराल रूप धारण कर लेती है। वस्तुतः काव्य को किसी घिसी-पिटी समीक्षा - शब्दावली में बाँध कर बौना बनाना सृजन के साथ अन्याय करना है । उसे किसी खास परिभाषा में भी बाँधना अनुभूतियों को आघात पहुँचाना है । ये अनुभूतियाँ किसी काल की प्रतीक्षा नहीं करतीं, जब भी अवसर मिला, आभ्यान्तर से निःसृत होने लगती हैं ।

आज काव्य-क्षेत्र में अनेक नए-पुराने हस्ताक्षर दिखाई पड़ते हैं जिनमें कुछ ऐसे हैं जो वर्षों साधना करने के बाद भी अपना कोई संग्रह प्रकाशित कराने में असमर्थ रहते हैं और कुछ सहकारी संगठनों के माध्यम से अपनी रचनाएँ प्रकाश में लाते हैं । यह आवश्यक नहीं कि उनकी रचनाएँ सभी स्तरीय हों क्योंकि स्तर की भा परिभाषा आज बदल गई है और कविता वर्गों में बँट गई है। लेकिन कुछ रचनाकार हैं जो स्वांतः सुखाय अपनी लेखनी का उपयोग कर रहे हैं और जो भी मन में आता है बिना किसी छंद-लय अथवा आलोचना-पद्धति की परवाह किए लिखते जाते हैं ।

पिछले दिनों कुछ पाण्डुलिपियाँ तथा काव्य-कृतियाँ देखने में आईं। एक सद्गृहिणी की पाण्डुलिपि भी देखने का मुझे सुअवसर मिला। डॉ. प्रेमा खुल्लर की इस कृति में कहीं दबी-सहमी भावनाओं को ज्वार मिला तो कहीं रंग-बिरंगी अभिव्यक्तियों में छाए संदेश, श्रृंगार, समय के प्रतिबिम्ब, रात के अँधेरे और मोती से आँसू, कुछ आधे-अधूरे सपने और दर्दीले चित्र । इन सबको किसी साँचे में ढालना अनुकूल नहीं होगा। प्रेमा अपने नाम के अनुरूप अपने पारिवारिक प्रेम को सार्वभौमिक बना देती हैं और उनका सृजन अपने ढंग से कोरे कागज़ पर उतरने लगता है। संस्कृत की विदुषी होने के नाते उनसे उर्दूनिष्ठ हिन्दी की अपेक्षा और अधिक भाषायी प्रांजलता की अपेक्षा है। वे साधना-पंथ पर अनवरत आगे बढ़ती रहें । इसी आशा के साथ,

"छटपटाहट"

"Restlessness"

"छटपटाहट" के लिए स्व. डॉ० श्याम निर्मम के दो शब्द

प्रख्यात वरिष्ठ साहित्यकार और कवि।

डॉ० प्रेमा खुल्लर से मेरा पहला परिचय एक कवयित्री और सद्गृहिणी के रूप में हुआ, पर जब उनकी कहानियों की पांडुलिपि देखी तो सुखद आश्चर्य हुआ कि वह केवल एक भावुक कवयित्री ही नहीं बल्कि एक जागरूक कहानीकार भी हैं। उनके काव्य-संग्रह 'राह बना लूंगी' को पढ़ते हुए लगा नारी होने के नाते उनमें नारी मनोविज्ञान की समझ अत्यधिक है, इसी कारण वह विचारों, घटनाओं और परिस्थितियों को बाँधने और उन्हें अभिव्यक्ति देने में सफल रहीं।

कविता में संक्षिप्ति के कारण जीवन जगत् की परिस्थितियों के फैलाव की कुछ गुंजाइश कम होती है, शायद यही वजह रही कि डॉ० प्रेमा अपनी कहानियों में मात्र अपनी कल्पनाशीलता और भावनाओं को साथ लेकर नहीं चलीं बल्कि यथार्थ के धरातल पर नारी की मर्यादा, उसके आक्रोश, सुख-दुख और उत्थान - पतन को अपनी कलम से अभिव्यक्ति देने की सार्थक कोशिश भी की।

ये कहानियाँ व्यक्ति, परिवार, समाज और देश की एक ऐसी शक्ति के रूप में सामने आती हैं, जिनमें भले ही पूर्ण परिपक्वता न झलके, पर नारी-पुरुष के आपसी रिश्तों, आधुनिकता की दौड़ में जीवन की भटकन, मन की बढ़ती पीड़ा और छटपटाहट के बाद अकेलेपन का चुभता दंश, मिलन और बिछोह के पलों की भयावहता के साथ चीत्कार करते सम्बन्ध और जन्म से लेकर मृत्यु तक नारी-मन में पलते सुखों-दुखों से बँधे पलों की अभिव्यक्ति हैं- ये कहानियाँ ।

नारी-मन के अनेक किस्से इन कहानियों के हिस्से बने हैं, पर आज की कहानी जिस दौर से गुज़र रही है, उसमें प्रेमा जी को अपनी कहानियों की भाषा को और अधिक प्रखरता के साथ प्रस्तुत करना होगा, तभी वह आज के मनुष्य की जटिलताओं, जीवन की ऊहापोह और सामाजिक सरोकारों को अधिक गहराई से प्रस्तुत कर सकेंगी।

इन कहानियों का सबसे प्रमुख पक्ष जो सामने आता है वह है इन कहानियों की सरलता, सहजता और सादगी, जिनमें न बनावट है न. बुनावट । जो देखा सहा, वही बिना लाग-लपेट के लिखा । प्रेमा जी की कहानियों में संभावनाओं के साथ-साथ आत्मीय रिश्तों की एक ऐसी गंध भी छिपी है जो निश्चित ही समय के साथ उजागर होने को व्याकुल दिखायी पड़ती है। मेरा विश्वास है कि ये कहानियाँ आपसे संवाद बनाकर किसी स्तर पर बतिया भी सकेंगी।

"छटपटाहट"

"Restlessness"

"छटपटाहट" के लिए डॉ० प्रतिमा वर्मा के दो शब्द

प्रसिद्ध साहित्यकार, लेखक और कथाकार।

श्रीमती प्रेमाखुल्लर के सृजन - उपवन का प्रथम पुष्प "छटपटाहट" नारी जीवन की विवशताओं का यथार्थ परक चित्रण है । यह अनुभूत सत्य है कि पुरुष प्रधान समाज का लिखित व अलिखित संविधान नारी अस्मिता की सदा से अवहेलना करता आया है । वह बेटी हो, प्रेमिका हो, पत्नी, गृहणी, माता या कामकाजी महिला- हर तरफ उसके लिये शोषण का फंदा तैयार रहता है ।

इन सारे आयामों को लेखिका ने सजगता से स्पर्श किया है । 'कसक' का टूटा प्रेम विवाह, 'भटकाव' की कामकाजी महिला का यौन शोषण, 'प्रतिदान' का बाधित प्रेम, 'अनछुई विधवा' में जीवन का दुःखद उतार चढ़ाव, 'सम्बन्ध के दायरे में विधवा का अकेलापन, 'सिसकता आंचल' में अपने ही परिवार द्वारा छली गयी महिला, 'आखिर क्यों' में पारिवारिक कलह, 'आर्तनाद' की न्याय से वंचित युवती, 'छटपटाहट' की ग्रामीण वियोगिनी का दुःखद अन्त, हमारे आसपास की जीवन्त सच्चाई है जिनका वर्णन लेखिका ने सरल किन्तु मार्मिक ढंग से किया हैं ।

सभी कहानियाँ अनुभव तथा संवेदना से सम्पृष्ठ हैं । अन्य भाषा भाषी होने से रचना - शिल्प प्रभाव पड़ा है । मुझे विश्वास है कि इनकी आगामी रचनाओं में हमे सशक्त प्रस्तुति देखने को मिलेगी । लेखक समाज का सजग प्रहरी होता है । यह लेखिका ने अपने इस प्रथम प्रयास में ही सिद्ध कर दिया है । हिन्दी साहित्य की दहलीज पर इस नई दस्तक से आशाएं हैं ।

अतिरिक्त रचनाएँ