कविता संग्रह

अगस्त 19, 2026

"बदलाव"

बदलाव कविताओं का एक गहरा मार्मिक संग्रह है जो मानवीय भावनाओं, सामाजिक संघर्षों और रिश्तों की बदलती गतिशीलता के सार की खोज करता है। मर्मस्पर्शी छंदों के माध्यम से संग्रह, आधुनिक, पारिवारिक जीवन की कठोर वास्तविकताओं पर प्रकाश डालता है जहाँ वृद्ध माता-पिता जो कभी पूजनीय थे, अब उपेक्षा और परित्याग का सामना कर रहे हैं। स्वार्थ से ग्रसित दुनिया में उनके दर्द को अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है। उनकी उपस्थिति को केवल बोझ बना दिया जाता है। ये कविताएं माता-पिता के अलगाव से गूंजती हैं जो प्रेम और कर्तव्य के लुप्त होते बंधनों पर गहन चिंतन को उद्घाटित करतीं हैं।

"राह बना लूँगी"

प्रस्तुत काव्य संग्रह मेरे कवित कर्म के सभी रूपाकारों का उन्मेष है. मुक्त छंद के साथ इसमें गीत, ग़ज़ल का भी समावेश है. इस काव्य में भावुकता में छायी अभिव्यक्तियाँ, सन्देश और श्रृंगार का सौंदर्य, समय का प्रतिबिम्ब प्रतिबिंबित है. एक तरफ प्रकृति का मनोहर है तो दूसरी तरफ देश प्रेम का गौरव अपनी विजय दुंदुभि बजा रहा है। “वीरों ने अपनी जान गवां गौरव फेहराया अवनि पर”.

"यादें जिंदा हैं"

यादें जिंदा हैं-इन सभी कविताओं में मन की भावुकता, संवेदनशीलता, जीवन दर्शन, प्राकृतिक सानिध्य, व्यथा, समय व मन की स्थिति को छूने का प्रयास, साथ ही साथ स्मरण की स्वाभाविक कसक हर रूपों में उभर कर सतह पर आती जान पड़ती है।

"अंकित कर दूँ"

अपने काव्य विषयों का चुनाव मैंने रोज़मर्रा की जिंदगी के अपने अनुभवों व अनुभूतियों से ही किया है। इस काव्य संकलन में मैंने सामाजिक उत्पीड़न, प्यार, व्यथा, जीवन, नारी स्थिति, दर्शन, प्राकृतिक सांनिध्य, समय व मन की स्थिति को छूने का प्रयास किया है।

"शब्दों के दायरे"

इस काव्य में मैंने शब्दों के दायरे में रहकर स्वयं को संयत रखा, प्रभावों में कहीं कोई दायरा नहीं। वह अपनी अभिव्यक्ति हर रूप में किए जा रहा है। मेरा काव्य संग्रह “शब्दों के दायरे”, मानव जीवन के कुछ अबूझ और दर्द भरे पहलुओं को उजागर करने का एक आईना है। मेरे इस काव्य के भावों में भिन्नार्थक अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना में कोई रुकावट नहीं है। तभी तो अविधा, व्यंजना और लक्षणा की अभिव्यक्तियां यत्र-तत्र व सर्वत्र बिखरी मिलती है।

"प्यारा बरगद कहती डाली"

प्यारा बरगद कहती डाली भी भारतीय समाज की सामाजिक समस्याओं की ओर संकेत देती है। मानवी दुर्बलताएं, दुर्व्यवहार, ईशा, द्वेष, अलगाव मैं जैसी कमजोरियों के हाथ फर्जहीन इंसान इंसानियत का मतलब खो बैठता है। समाज के पनपे-बदलते रिश्ते, बिखरती मानवता, टूटते सपने, वेदना, दर्द, प्यार व धोखे के एहसास तथा प्रेम, सौंदर्य की अनुभूति की सहज अभिव्यक्ति है। मानव जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव और उससे पीड़ित होने की जो वेदना है, वह मानव मन को हिलाकर रख देती है। माँ संसार में पूजनीय है पर उसका तिरस्कार, उसे पीड़ा पहुंचाना अंतर्मन को झकझोर देता है। यह काव्य संग्रह माँ की तमाम अनकहीं वेदनाओं से भरा पड़ा है। यही वजह है की आँखों के आंसू सूखते नहीं।

"माँ शब्द को बदनाम क्यों किया"

“माँ शब्द को बदनाम क्यों किया” की कविताएं धड़कते हृदय का स्पंदन है। मानवीय व्यथा, वेदना की चितकारिता से कराह मारती हुई सामाजिक स्थिति का मूल्यांकन कराती है। इन सभी कविताओं में मन की भावुकता, संवेदनशीलता, जीवन दर्शन, समय व मन की स्थिति को छूने का प्रयास है। साथ ही साथ स्मरण की स्वाभाविक कसक हर रूपों में उभर कर सतह पर आती है।

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