चिंतन संग्रह

अगस्त 19, 2026

"मैं सोचती हूँ"

41 लेखों से युक्त यह पुस्तक एक लघु वाटिका के समान है, जिसमें 41 ऐसे पौधे हैं जिनकी हर शाख हर पत्ती, हर फूल बहुमूल्य सुविचारों को संजोए हुए हैं। वर्तमान युग में जहाँ अधिकांश लोग दिशा-भ्रमित हैं, संवेदनहीनता लगातार पांव पसारती जा रही है। एवं मानव अमानवीयता का शिकार होता जा रहा है।  उसने सोचने-समझने को भुला दिया है और अपने स्वार्थ के वशिभूत होकर अंजान रास्ते में भटकने को आतुर है। यह पुस्तक, एक सार्थक एवं रचनात्मक हस्तक्षेप करने वाली कृति के रूप में उपस्थित होती है।

“मैं सोचती हूँ” में मैंने मानव जीवन की विवेचना की है तो उसमें भी एक लय है, गति है, भाव है, भावनाएं हैं, रोना-हंसना, उठना-बैठना, तरह-तरह के आचरण का सम्यक निवेश है। यही वजह है, मैंने अपने कुछ विचारों को जीवन से शुरू उसके क्रिया-कलाप, ज्ञान- व्यवहार, तनाव, तड़प, मनभावना, प्रार्थना के आसपास घूमाकर पृथ्वी, वायु, फूलों की वादियों से सामाजिक दायित्व और मेरा भारत पर लाकर खड़ा कर दिया है।

"आज की नारी-एक विहंगम दृष्टि"

आज की नारी-विहंगम दृष्टि-जिसमें नारी के बढ़ते कदम मेरी विमर्श दृष्टि की एक उत्तम बानगी है। इसमें नारी की नवीन होती सोच को एक ऊंचा स्थान देकर विश्व की दौड़ में उसका एक अहम अस्तित्व माना है जिसमें मानवीय मूल्यों की अहमियत दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति की धरोहर के रूप में संभालने वाली नारी आज स्वयं ही एक नेपथ का निर्माण करने वाली सहज विभूति है। वह आगे बढ़ते कदमों से तरक्की के रास्ते खोज रही है।

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